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रोज़ी, इंसाफ़ और इंसानियत

sushilkumar babra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर इक हक़ीक़त को दोगे तुम इम्तिहाँ कहाँ तक,
        
                                                    
                            
यूँ रोज़ जीस्त होगी ज़ेर-ए-गुमाँ कहाँ तक।
जो अहल-ए-बहर ठहरे, उनका यही वज़ीफ़ा,
रिज़्क़-ए-हलाल पर भी उठेगा धुआँ कहाँ तक।
लबरेज़ हैं निगाहें तअस्सुबों की गर्द से,
आईना-ए-ज़मीर रहेगा बे-निशाँ कहाँ तक।
दस्तूर-ए-अद्ल आख़िर सबके लिए है यकसाँ,
मिज़ान झुकेगा साहिब-ए-अरकाँ कहाँ तक।
दस्तरख़्वान-ए-ग़ुरबत पर अश्कों का नमक है,
रोटी को बाँट देगा ये कारवाँ कहाँ तक।
दरिया ने जिनको बख़्शी तहज़ीब की विरासत,
उन पर चलेगी नफ़रत की दास्ताँ कहाँ तक।
मंसब के ताज वालों, कुछ दर्द भी समझ लो,
महफ़ूज़ रहेगा ज़ुल्म का आशियाँ कहाँ तक।
औक़ात क्या है उसकी जो भूख से है लड़ता,
तुम उसको दोगे हर सू नया इम्तिहाँ कहाँ तक।
मस्जिद हो या कि मंदिर, सबका ख़ुदा है वाहिद,
नफ़रत उठाए फिरती ये बदगुमाँ कहाँ तक।
इंसाफ़ की हवाओं को क़ैद कर न पाओगे,
सच्चाई दब सकेगी ज़ेर-ए-फ़ुग़ाँ कहाँ तक।
सुख़न में तल्ख़ियों का सबब 'बाबरा' यही तो है,
हम ख़ामुशी निभाएँगे इम्तिहाँ कहाँ तक।
2 महीने पहले
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