यह इल्म रहे हर वक़्त तुझे , तेरी रुखसत से रुसवाई है ,
बिन बात के भी न जाने क्यों , ये आँख भी भर आई है।
न खत लिक्खा, पैगाम दिया , न जाने का इजहार किया ,
एक हल्की सी मुस्कान सी दी , और तोडा लम्बा साथ सदा ,
तेरी छूटी परछाईं सदा ही, मांगे अपनी अस्मत को,
भरे नूर सा दामन तेरा खुशियों की तुझ पर रहमत हो,
जो चला यहाँ से छूने आसमां, पर इतना यह इल्म रहे,
चौखट आँगन की राह तकै, तेरे ही दीदारों को ,
आती बारी सबकी एक दिन , दिल को यह समझाई है ,
बिन बात के भी न जाने क्यों , ये आँख भी भर आई है।
-सुशील चंद्र गुप्त " सोहाने"