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मुक्तक

Suryansh Shukla

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            खुद पे बीती हुई वो कहानी वो कथानक पढ़ें जा रहे हैं।
        
                                                    
                            
साथ संघर्ष की कुछ जुबानी तब ये मानक गढ़े जा रहे हैं।।
रोज गिर गिर के संभले थे तब ये ,आया हुनर आज हम में।
उनको लगता है तब भी की ये हम, बस अचानक बढे जा रहे हैं।।
-सूर्यांश शुक्ल
3 महीने पहले
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