श्रावण पूर्णिमा
सावन की फुहार में
श्रावण पूर्णिमा की बहार में,
मन का पोर- पोर
भीग रहा।
भगिनी की यादों
में डूबा
लो फिर एक और
रक्षाबंधन बीत रहा।
दहेज की बलिवेदी पर,
वो तुम्हारा यूं चले जाना
मन को आज तक
छीज रहा।
दहेज के हाथों मिला
आज फिर एक नासूर
टीस रहा।
'सूर्य' दूर कहीं,
खड़ा किसी वीराने में,
उस मासूम की याद में
सिसक रहा।
बस यूं ही
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा