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सपनों के सौदागर

Surya Kant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सपनों के सौदागर
        
                                                    
                            

सपने भी क्या हैं?
कभी दिल को
भरमाते,
कभी उसे खूब
तड़पाते,
दिल को भी
अब इस कशिश से
निकलने की जुगत
समझनी होगी।

सपनों का सौदागर भी
गर नमूदार हो
तो! फिर तो ! उसे
पूरी कायनात को
समझना होगा।

सपनों का सौदागर
गर दिल के साथ हो
तो फिर मसले को
ग़ौर से समझना होगा।

पर यही सपनों का
सौदागर गर हो जाए
सियासत का सिपहसालार,
तब तो आवाम को
कुछ करना होगा।

जब जब सियासत ने
गद्दी की लगाई फेरी है,
तब तब निज़ाम ने तो
आरती की थाली फेरी है,
बस इसी अहम मसले को
समझना होगा।
बदले आलम औ आलमी
अंदाज़ में सपनों के सौदागर
को अब बदलना होगा।

नहीं तो नींद को
अब नूर - ए -चश्म
से शहर -बदर होना होगा।
सपनों के सौदागर को
आवाम के सपनों को
समझना होगा।

सपनों को महज़
सब्ज़ बाग़ न समझ,
उसे भी अब सच की
ज़मीं पर उतारना होगा।
इंसानियत और कुदरत के
अलम और तक़ाज़ों को
बा -अदब
बा -कलम ,
समझना होगा।
माना के साहिर की
सहर,
अब सपनों के
सौदागर की ज़द में
नहीं,
पर आधी आबादी के
ज़मीर से उठी
आवाज़ को हर हाल
बस सहर में बदलना होगा।
-सूर्यकांत शर्मा
2 महीने पहले
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