साल गुजरते जाते,,,
साल गुजरते जाते हैं ,
दिल की गिरह
खोलते जाते हैं,
इंसा की फितरत
की सिलवटें खोलते
जाते हैं।
अहम औ वहम
के भेद खोलते
जाते हैं।
ख्वाबों- ख़यालों
ख्वाहिशों की
कलई खोलते जाते हैं।
राग - विराग
रूप - रंग
रस - गंध
के राज़ खोलते
जाते हैं।
इबादत -मुहब्बत
के भेद खोलते जाते हैं।
ज़िंदगी के नए नए
आयाम खोलते जाते हैं।
चाहत और गुलाब के
छुपे -छुपे राज़ के
खोलते जाते हैं।
माँ की ममता
बाप के स्नेह के
रहस्य खोलते जाते हैं।
तिस पर भी इंसा
इंसा से बस अपना हाल
छुपाते जाते हैं।
काश के कोई ऐसी
भी कचहरी हो ,
जिरह हो !
जहाँ इंसा से इंसा
के मसले सुलझते
जाते
साल गुजरते जाते हैं
जीवन का हाल बताते
जाते हैं।
-सूर्यकांत शर्मा