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साल गुजरते जाते,,,

Surya Kant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            साल गुजरते जाते,,,
        
                                                    
                            
साल गुजरते जाते हैं ,
दिल की गिरह
खोलते जाते हैं,
इंसा की फितरत
की सिलवटें खोलते
जाते हैं।

अहम औ वहम
के भेद खोलते
जाते हैं।

ख्वाबों- ख़यालों
ख्वाहिशों की
कलई खोलते जाते हैं।

राग - विराग
रूप - रंग
रस - गंध
के राज़ खोलते
जाते हैं।
इबादत -मुहब्बत
के भेद खोलते जाते हैं।
ज़िंदगी के नए नए
आयाम खोलते जाते हैं।

चाहत और गुलाब के
छुपे -छुपे राज़ के
खोलते जाते हैं।

माँ की ममता
बाप के स्नेह के
रहस्य खोलते जाते हैं।

तिस पर भी
इंसा से इंसा का
बस अपना हाल
छुपाते जाते ।

काश के कोई ऐसी
भी कचहरी हो ,
जिरह हो !
जहाँ इंसा से इंसा
के मसले सुलझते
जाते हों,
साल गुजरते जाते हैं।
जीवन का हाल बताते
जाते हैं।
-सूर्यकांत शर्मा
2 महीने पहले
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