कुदरत,,
कुदरत मेहरबां हो तो,
इंसा कायनात पर भी,
हुकूमत करता है।
गर हो नाराज़,
तो अपने साए से भी,
डरता है।
कुदरत की मर्ज़ी में,
सज़ा भी मज़ा है।
पर इस से खुदगर्जी
कज़ा ही कज़ा है।
इंसा गर कुदरत को,
समझे और सजदे
में रहे,
वालिद ऑ वालिद
की मानिंद,
ये तो पूरी कायनात की
सदा है।
कुदरत कभी कमज़र्फ
नहीं है,
ये इत्ते से,
बित्ते से,
इंसा को पता है।
पर इंसा इंसा में फ़र्क है,
जिसने इस कायनात के
इस उसूल को समझा
वो कभी कुदरत से
ना उलझा।
हमारी तहज़ीब ओ
इल्में सफीना में,
कब से लिखा।
बा अदब बा नसीब
बे अदब बे नसीब।
कुदरत ऑ खुदा को
कुछ भी नहीं दरकार,
बस बंदे को,
मानना है,
रहना है ,
इसकी इबादत में,
फर्माबरदार।
-सूर्य कांत शर्मा