पीढ़ियों का अंतर
पीढ़ियों से पीढ़ियों
के मत मतांतर
ऑ अहसास ओ
अंदाज़ ए बयां!
मुख्तलिफ होते
जा रहे ।
संवाद के घटते
चांद को लील रहा
पीढ़ियों का अंतर?
नहीं अंदाज़ ए बयां!
सादगी औ किफायत
जो कभी थी
एक अहम आदत
होती जा रही
अब बीते ज़माने
की रवायत।
पीढियां हैं तो आख़िर
पीढियां ही,
दोनों के अपने अपने
मसले हैं
जो वक्त ने अपने ही
अंदाज़ में उनकी ओर
उछाले हैं ।
वो चुपचाप रह कर
विघ्नों को सहन कर
पुरुषार्थ करने की आदी,
अब हर काम को जताकर
सोशल मीडिया पर
दिखाने की आदी।
यहाँ -वहाँ,कहाँ -कहाँ
बस आभासी ऑ
फ़कत आभासी!
ये भी एक अदा रही
पीढ़ियों के अंतर की
कुहासी।
सब कुछ सामने
पर कुछ नहीं हाथ
सब के सब डिजिटल
में सिमटे,
सब कंप्यूटर इंटरनेट
और अब ए आई
के साथ।
वो स्नेहिल स्पर्श
वो सानिध्य की मीठी
धीमी सी धीमी सी
मद्धिम मद्धिम साँस।
एक भौतिक
एक आभासी
हो गया लो
पीढ़ियों में अंतर।
नहीं नहीं सुरसा के
मुंह की मानिंद
बढ़ता जा रहा
पीढ़ियों में अंतर
छीजता जा रहा
पीढ़ियों का अंतर!?
-सूर्य कांत शर्मा