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पहचान की तलाश

Surya Kant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पहचान की तलाश,,,
        
                                                    
                            

पहचान की तलाश है,
युगों- युगों से,
जन्म- जन्मांतर से,
स्वयं से स्वयं की
तलाश है।

धर्म में-कर्म में,
या फिर स्व के
मर्म में
पहचान की तलाश है।

पंचभूत के विकारों में,
उसके आकार में
उसके निराकार में
पहचान की तलाश है।

काबा में काशी में
मूर्त में अमूर्त में
अल्लाह और ईश्वर
की पहचान की तलाश है।

सज़दे में रहूं
या के समाधि में
बस इसी वहम को
ख़ारिज़ करने की
तलाश है।

तेरी दुनिया में हैं
फरिश्ते भी
ऑ शैतान भी
पर उन्हें ठीक से
पहचान की तलाश है।

सुना है के
माँ के पैरों तले
जन्नत ऑ
पिता में आकाश ऊंचाई,
उसी सच्चाई की
तलाश है।

प्रारब्ध से पुरुषार्थ तक
पुण्य से प्रताप तक।
यहाँ वहाँ
कहाँ कहाँ
पहचान ही की
तो तलाश है।

सब ओर तलाशा
कभी अहम में
कभी वहम में
पहचान ही की
तलाश है।
-सूर्यकांत शर्मा
एक महीने पहले
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