मेघों का मौन
मेघों का मौन!
कौन कहे
किस से कहे
इन कातर मेघों का
मौन।
दूर खड़ी प्रकृति माँ
कह रही मानो मानव
से मौन।
कितने- कितने जतन
मैने किये रह- रह कर
के मौन।
तू न समझा
अब झेल तू
मेघों का मौन।
मेरे संतुलन को
छेड़ तू
अब पूछ्ता है
मैं कौन!?
मेघों का मौन
या फिर भयावह
जलवायु परिवर्तन !?
अपना प्रदेश
अपना देश
अपना समूह
और फिर कुछ
देश ऑ भूभाग
विशेष।
कुत्सित प्रयास
कुटिल संदेश
कर रहा जतन
बन अमीर देश।
कर कर के खूब
कार्बन उत्सर्जन
छीन रहा मेघों का
गर्जन।
साँसों को लीलता
जलवायु को चीरता
कर रहा जीवन को
मौन।
कर कर के
दोषारोपण
हो रहा गरीब देशों
का शोषण।
अब भी समय है
कर कुछ ख़ास
जतन,
तोड़ ले तोड़ दे
कैसे भी इन
क्षुब्ध मेघों का मौन।
-सूर्यकांत शर्मा