क्या हो हमराह !या हमसफ़र, ,,,.
जीवन के हमराह हो
या हमसफ़र
सोच कर बतलाना,
समझ कर जतलाना।
ज़िंदगी में मिलते हैं,
हमराह ही,
उसकी रहमत से ही
मिलता है हमसफ़र भी।
हमराह तो मिलेंगें,
जीवन के हर मोड़ पर।
हमसफ़र नहीं मिलता,
यूंही खड़ा हर मोड़ पर।
हमराह से हमसफ़र का
कोई वास्ता नहीं,
ये दिलों का मेल है,
कोई आता जाता,
आम रास्ता नहीं।
यूं ही हमसफ़र नहीं मिलता,
उसकी नवाज़ीश और
बड़ों की बा-अदबी से
मिलता है,ये कोहे -नूर।
ज़िंदगी के सफ़र में,
आगाज़ होता है,
हमराह से ही,
हमसफ़र तो अंजाम हुआ करते हैं।
हमराह से कदम दर कदम
चलने से
होता है, हमसफ़र होने का गुमां।
हमसफ़र गर मिल जाए,
कारगर,
हो जाएगी मयस्सर
ज़िंदगी ताउम्र।
गर हो परवरिश मुक्कम्मिल
ज़िंदगी की राह में खड़े
मिलेंगेँ,
एक साथ हमराह और हमसफ़र
लिए बुलंद मुस्तकबिल।
आपका मित्र
-सूर्य कांत शर्मा