हाथों में रची मेंहदी,,
यूं ही रचाई जाती,
हाथों में मेंहदी
हर ख़ास ओ आम
के माैके ब मौके।
हाथों पर हरी रंग की
लकीरों में
कोई इनमें ढूंढता
प्रेम का लाल रंग
तो कोई कुछ और
गहरा झांके।
कभी मुहब्बत
कभी इबादत
बस हाथों में
रची मेंहदी
ढूंढती मौके ब मौके।
कभी मुहब्बत में
कभी जुदाई में
मेंहदी रही बस
खुदाई में।
कभी हुस्न को निखारा
कभी इश्क़ को
पखारा।
कभी मीठी सी हँसी
तो कभी शोख सा
इशारा।
मेंहदी ने देखो
क्या क्या नहीं
सँवारा?!
कभी हाथों में
रच,
पिया का नाम
है ,छुपाया
तो कभी उसकी
याद को मेंहदी में
डुबोया।
मेंहदी तो मेंहदी
रही,
बस बदल गईं
इश्क़ ओ हुस्न
की कसमें
वक्त के साथ
समाज की रस्में।
कभी रहा होगा
दौर ए मुहब्बत
अब तो मेंहदी भी
दौर ए फैशन को
मेहमां!।
नक़ल के दौर में
फैशन परस्ती के
माहौल में,
इंसा के नए
फितरत ए दौर में
मेंहदी भी तलाशे
कोई और आस्मां,,
मेंहदी भी तलाशे
कोई और आस्मां,,,
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा