बीते पलों की वापसी
समय की नौका पर सवार,
चरैवेति चरैवेति चरैवेति!!!
न हाथ में लिए कोई
पतवार ।
बस यादों का खेला
लौटा देता ,
बीते पलों की मझधार।
जहाँ रुका है
सपनों और यादों का
एक उठता ज्वार।
उन्हीं यादों के भँवर में,
साहिर भी यहाँ नज़र
आते,
पीड़ा लिए अपार।
बीते पलों की वापसी
ले आती,
स्वार्गिक भजन की पंक्ति,
लिए साहिर की कलम के अशआर।
स्वर सम्राज्ञी लता की आवाजमें गूंजती
"तोरा मन दर्पण कहलाये,
और जताती
' मन के नैन हजार '।"
बीते पलों की वापसी
अब है आज की
आभासी दुनिया का अंगार।
कसमों वादों और यादों में,
पला बढ़ा महज
आभासी अम्बार।
यूं तो समय की नौका
कभी नहीं दिखाती
अतीत का कोई शाहकार।
तिस पर भी मन मस्तिष्क के हैं
न जाने कितने कितने
द्वार।
- सूर्यकांत शर्मा
मौलिक एवं स्वरचित