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बचपन की शरारत

Surya Kant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बचपन की शरारत
        
                                                    
                            

वो बचपन ही क्या
जिसमें शरारत न हो।

विद्यालय के शिक्षक
मोहल्ले के लोगों को
छकाने की आदत न हो।
बचपन की शरारत
होती हैं ,भविष्य की
हरारत।
वो बचपन ही क्या
जिसमें शिक्षक की
घुड़की न ही।
शरारतों के आलम में
पढ़ने की जुगत न हो।
वो बचपन ही क्या
जिसमें शरारत से न
चमके आँखें,
हँसी को दबा कर
बड़े बूढ़े न काँखे।
कभी कभी कुछ
ख़ास सी हो जाती
बचपन की शरारत।
शिक्षक के रौब दाब
को रोकने को
बलवती हो उठतीं
बचपन की शरारत।
ठंडाई में घोंटा जो
जमालगोटा,
वो मासाब
के पेट में ठोका।
फिर जो हुई
उनके पेट में लड़ाई
बस समझो कर
के शामत अपनी आई।
हाथ ऊपर करवा
के सब गुरुओं ने
बड़े स्नेह से ठोका ।
तिस पर भी
बचपन की शरारत थी
के गुस्से की हरारत थी।
स्कूल के हेडमास्टर
की इनायत थी,
के ठोकम पीटी
से हिदायत थी।
बचपन की शरारत है
हम सबको शिकायत है।
बस अब कुछ न करना
वरना स्कूल से है
तुमको निकलना।
तब भी याद थी
अब भी याद है
वो काग़ज़ की कश्ती
वो बारिश का पानी
और वही बचपन की
नादानी।
-सूर्यकांत शर्मा
 
2 घंटे पहले
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