*बादलों की पाती *
प्रकृति के रुदन पर
बादलों में रोष है।
मनुष्य के लालच पर
अब बादलों की पाती में
बरस रहा आक्रोश है।
बादलों ने अपनी पाती में कहा
अब बस जलवायु परिवर्तन शेष है।
धरा की कोख में
बस बंध्याकरण
वेश है।
बादलों की पाती में अब प्रकृति का रोष ,,
घटते जा रहे अब
वसुंधरा के
शस्यश्यामला मेखला
दायरे।
तिस पर भी बादलों
में अब भी बची
मानवों हेतु करुणा
विशेष है।
ब्रह्मांड के नेह में
अपनी धरा जीवन
का सुंदर प्रलेख है।
पर फिर भी मानव
के लिए,
बादलों की पाती में
परा शक्ति का उल्लेख है।
मानव जनित बढ़ता
प्रदूषण,
बना रहा धरा को
अस्तित्व का शेष है।
बादलों की पाती में,
युद्ध के उन्माद औ आतंक के
तांडव कोअंतिम संदेश ही
अब शेष है।
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा