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अनजानी मंज़िलों के मुसाफ़िर

Surya Kant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अनजानी मंज़िलों के मुसाफ़िर
        
                                                    
                            

जीवन ठहरा बस
अनजानी मंज़िलों का मुसाफ़िर ,
एक धुंध से दूसरी धुंध तक के
सफर का मुसाफ़िर।
उसी रस्ते पर कितने
कितने मोड़ ऑ घुमाव,
कौन कब कहाँ जाना
ये बेचारा मुसाफ़िर।

दो सिरों के बीच
जीती- जागती ज़िंदगी
बस यहीं पर चलता
जाता मुसाफ़िर।

रास्ता ख़ास के
मंज़िल ख़ास,
अब ये तो जाने
और बताए मुसाफ़िर ख़ास।

यूं भी कुछ ज़िंदगी का
तज़ुर्बा रहा,
मंज़िल से खूबसूरत सफ़र रहा।

प्रारब्ध औ भविष्य में
गर कोई सफ़र में रहा
तो वो बस मुसाफ़िर रहा।
आगाज़ से अंजाम तक
बसी यही सिलसिला रहा,
चलता- बढ़ता,
देखता- ताकता
सोचता- गुनता
राह चलता बस
मुसाफ़िर रहा।

कभी फ़र्ज़ों की
कभी कर्ज़ों की
लिए हल्की भारी
गठरी,
बस जो भी रहा
अनजानी मंज़िलों का
मुसाफ़िर रहा।

कदमों के निशाँ
छोड़ता,
तजुर्बों को लिख छोड़ता।
वादों में हँसता- गाता,
यादों में रोता-बिलखता,
यौवन में झूमता,
बुढ़ापे में झूलता,
वो बस वो
देखो ,' सूर्य ',
सुबह के धुंधलके से
शाम के झुटपुटे में
आता- जाता
अनजानी मंज़िलों का
मुसाफ़िर ख़ास।
-सूर्यकांत शर्मा
3 महीने पहले
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