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चंद लम्हों की दौलत

Suresh Mulchandani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी जो ठहर कर ख़ुद से बात की,
        
                                                    
                            
तो ज़िंदगी की हक़ीक़त सामने आ गई।
ख़्वाहिशें तो आसमान से भी ऊँची थीं,
मगर उन्हें जीने को उम्र ही कम पड़ गई।

जो सुकून कभी चंद लम्हों की पनाह में मिला था,
वो आज यादों की धूल तले कहीं गुम हो गया।
इंतज़ार की बेचैनियाँ अब साँसों में उतर आई हैं,
और गुज़रा हुआ हर लम्हा बस ख़्वाब बनकर रह गया।

ज़िंदगी यूँ ही वक़्त की राहों पर चलती रही,
हक़ीक़त ख़ामोश रही, ख़्वाब बोलते रहे।
हम ख़ुद को ही तलाशते रहे उम्र भर,
और मंज़िल हर मोड़ पर बदलती रही।

अब पीछे मुड़कर देखता हूँ,
तो एहसास होता है—
पूरी ज़िंदगी तो बस उन चंद लम्हों की ख़ातिर ही जी थी,
बाक़ी सब तो वक़्त की किताब के ख़ामोश सफ़े थे।

उन कुछ लम्हों का उजाला आज भी दिल में ज़िंदा है,
शायद वही मेरी सबसे बड़ी दौलत,
और वही मेरी पूरी ज़िंदगी है।
— सुरेश
3 महीने पहले
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