आऊँगा… एक आख़िरी दफ़ा तुमसे मिलने।
क्योंकि इश्क़ की सबसे गहरी दास्तान वही होती है,
जहाँ आँखें सब कुछ कह देती हैं,
मगर लबों से “अलविदा” कभी निकला ही नहीं करता।
सुना था मैंने…
इश्क़ मुकम्मल वहीं होता है,
जहाँ किस्मत साथ छोड़ देती है,
मगर मोहब्बत आख़िरी साँस तक साथ निभाती है।
तो एक आख़िरी दफ़ा आऊँगा मैं,
तुम्हारे पास यूँ ही ख़ामोश बैठने,
बिना किसी शिकायत… बिना किसी सवाल के।
न कोई शिकवा होगा,
न कोई गिला होगा,
बस तुम्हारी मौजूदगी को
अपनी ज़िंदगी की सबसे हसीन याद बना लूँगा।
तुम्हें इतना देखूँगा कि
अगले जन्म तक मेरी आँखें
हर चेहरे में सिर्फ़ तुम्हें ही तलाशती रहें।
और फिर…
मैं चुपचाप लौट जाऊँगा।
तुम्हें तुम्हारी हसीन दुनिया मुबारक…
मैं वहीं ठहरा रहूँगा,
उस मोड़ पर,
जहाँ वक़्त ने चलना छोड़ दिया था,
और मेरी रूह
एक जलती हुई शम्मा की तरह
सिर्फ़ तुम्हारे नाम की लौ में
उम्रभर सुलगती रहेगी।
शायद लोग इसे इंतज़ार कहें,
मैं इसे अपनी इबादत कहूँगा।
क्योंकि कुछ मोहब्बतें
मिलकर पूरी नहीं होतीं,
बिछड़कर अमर हो जाती हैं।
और अगर कभी
तुम्हें मेरी याद आए…
तो आसमान की किसी ख़ामोश रात में
एक टिमटिमाते सितारे को देख लेना,
शायद वही मेरी रूह हो,
जो आज भी तुम्हारे लौट आने की
उस अटूट उम्मीद पर ज़िंदा है—
जो मौत के बाद भी मेरे वजूद को मिटने नहीं देगी।
— सुरेश