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भीतर का दरवा

Suresh Mulchandani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ज़िंदगी का कोई पासवर्ड नहीं होता…
        
                                                    
                            
बस नज़रिए से इसके दरवाज़े खुलते हैं,
कुछ लोग हालात बदलने निकल पड़ते हैं,
कुछ अपने भीतर का mindset बदल लेते हैं।

कोई वक़्त से लड़ता है,
कोई वक़्त को समझना सीख जाता है,
कोई मंज़िल के पीछे भागता है,
कोई सफ़र को ही जीना सीख जाता है।

जो दिल की सुनकर जीने लगते हैं,
उन्हें अक्सर “कमज़ोर” कह दिया जाता है,
जो भीड़ की धारा में नहीं बहते,
उन्हें दुनिया dead fish कहकर
हँस देती है, मज़ाक उड़ाती है।

मगर सच तो ये है—
ज़िंदा वही नहीं जो साँस ले रहा है,
ज़िंदा वो है जो अपने होने का
अर्थ समझकर जी रहा है।

सही क्या है, ग़लत क्या है—
हर मोड़ पर इसका फैसला कहाँ होता है?
कभी टूटना भी ज़रूरी होता है,
तभी इंसान भीतर से मज़बूत होता है।

हालात हमारे हाथ में नहीं,
पर उन्हें देखने का नज़रिया अपना है।
कल क्या होगा—किसे मालूम,
मगर आज को कैसे जीना है,
ये फैसला अपना है।

थोड़ा तथ्य पर भरोसा रखो,
थोड़ा अपने कर्म पर,
और बाकी उस शक्ति पर छोड़ दो
जो हमसे बड़ी है।

क्योंकि ज़िंदगी का असली राज़ शायद यही है—
हर दरवाज़े की चाबी बाहर नहीं मिलती,
कुछ दरवाज़े भीतर से खुलते हैं…
जहाँ Mindset बदलता है,
वहीं से ज़िंदगी बदलना शुरू करती है
-सुरेश
2 घंटे पहले
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