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भरोसे का अंत

Suresh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            किसी ने ,
        
                                                    
                            
सच ही - -
कहा है कि,
नज़र से - -
इतना भी ,
मत गिर जाओ - -
दुबारा नज़र,
मिलाने लायक - -
ही ना रहो,
अर्थात् - -
किसी को ,
अंदर से - -
टूटने पर,
मजबूर कर - -
दिया जाय,
और - -
उसके बाद ,
उम्मीद किया जाय - -
सब पहले,
जैसा हो जायेगा - -
बिल्कुल ही,
निरर्थक - -
साबित होगा,
अर्थात् - -
इसका कोई ,
अर्थ ही - -
नहीं होगा l

और अंत में ,
यही - -
कहा गया है कि,
मुर्दे को - -
कभी भी ,
जिन्दा नहीं - -
किया जा सकता,
अर्थात् - -
लाख सजा दो ,
उन कब्रों को - -
जो खो गया है,
या यों कहे - -
दफन हो गया है,
वो कभी भी - -
जिन्दा नहीं,
हो सकता है l
-सुरेश कुमार झा 'अल्हर'
एक घंटा पहले
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