आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

भरोसे का अंत

                
                                                         
                            किसी ने ,
                                                                 
                            
सच ही - -
कहा है कि,
नज़र से - -
इतना भी ,
मत गिर जाओ - -
दुबारा नज़र,
मिलाने लायक - -
ही ना रहो,
अर्थात् - -
किसी को ,
अंदर से - -
टूटने पर,
मजबूर कर - -
दिया जाय,
और - -
उसके बाद ,
उम्मीद किया जाय - -
सब पहले,
जैसा हो जायेगा - -
बिल्कुल ही,
निरर्थक - -
साबित होगा,
अर्थात् - -
इसका कोई ,
अर्थ ही - -
नहीं होगा l

और अंत में ,
यही - -
कहा गया है कि,
मुर्दे को - -
कभी भी ,
जिन्दा नहीं - -
किया जा सकता,
अर्थात् - -
लाख सजा दो ,
उन कब्रों को - -
जो खो गया है,
या यों कहे - -
दफन हो गया है,
वो कभी भी - -
जिन्दा नहीं,
हो सकता है l
-सुरेश कुमार झा 'अल्हर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर