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अगर सच में ईश्वर कही बैठा होगा – कल्पना

suraj patel

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अगर सच में ईश्वर कही बैठा होगा – कल्पना
        
                                                    
                            

अगर सच में ईश्वर कहीं बैठा होगा,
तो हमारी इन चालाकियों पर चुपके से हँसता होगा।
हम मुखौटे पहनकर घूमते हैं यहाँ,
अंदर कुछ और, बाहर कुछ और दिखाते हैं जहाँ।
वो बंद आँखों से भी सब देख लेता होगा,
हमारी इन बेतुकी कोशिशों पर हँसता होगा।
मंदिरों में दुआएँ, और दिल में दग़ा रखते हैं,
ज़ुबाँ पे मिठास, और नज़रों में अनबना रखते हैं।
जब हम धर्म और अच्छाई का ढोंग रचाते होंगे,
वो सोचता होगा—'ये किसे बेवक़ूफ़ बनाते होंगे?'
अंदर का अंधेरा छिपाकर, बाहर जो उजला बनते हैं,
वो इंसान के इस दोहरेपन पर मुस्कुराता होगा,
और सोचता होगा...
"बनाया तो मैंने इसे अपने अक्स जैसा था,
ये मिट्टी का पुतला आज क्या से क्या बनता होगा!"
एक छोटा सा ख़याल:
ईश्वर को रिझाने के लिए सादगी ही काफ़ी है, क्योंकि जो सच छुपाने की कोशिश करता है, वो दुनिया को भले छले, पर उस 'बनाने वाले' से कुछ छुपा नहीं पाता।
-सुरज पटेल
2 महीने पहले
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