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अब चलो राह पुरानी

Sunita Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अब सावित्री की कथा किसी को,
        
                                                    
                            
बिल्कुल नहीं सुहाती है।
क्यों सीता वन वन भटकीं थी।
मन को अब नहीं भाती है।
इन आदर्शों को पुस्तक में,
अब नहीं पढ़ाया जाता है।
नाना नानी के किस्सों को,
अब नहीं सुनाया जाता है।
कान्वेंट में पढ़ना ही अब,
है बना शौक अमीरों का।
आज हर दूसरा समाचार है,
बिकते हुए जमीरों का।
धक्का कोई देती पर्वत से,
कोई नीले ड्रम में भरती है।
कोई नाग से डसा डसा कर,
पति के प्राणों को हरती है।
पतिव्रतायें ये नारी क्यों,
नर पर भारी होती जाती है।
सोच सोच कर बुद्धजीवी की,
बुद्धि चकराती जाती है।
निकलो बाहर इस चकाचौंध से,
आदर्शों को फिर से अपनाओ।
फिर से जोड़ों परिवारों को।।
मन के सारे भेद मिटाओ।
बैठो मिलजुलकर सब फिर से,
पूर्वजों की कथा सुनाओ।
आज नहीं तो कल हम सबको,
वहीं राह पुरानी चलना होगा।
जहां लोरी गाती माता होगी और,
बच्चों का झूलता पलना होगा।
3 महीने पहले
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