बच्चों के संग बैठी तो,
अपना बचपन याद आया,
उनकी तोतली बोली में,
मेरा बीता कल मुस्काया।
एको एक, दवो दो,
होड़ लगाकर गाते थे,
सौ तक गिनती गिनते-गिनते,
हम भी कितना इतराते थे।
अ से अनार, आ से आम,
क से कबूतर उड़ जाता था,
ज्ञ से ज्ञानी बनने तक,
पूरा वर्णमाला रट जाता था।
वो मस्ती, वो शरारत,
वो बिना बात मुस्कुराना,
आज उन्हीं बच्चों में फिर से,
खुद को देखा, खुद को पाना।
छोटी-छोटी जिद्द उनकी,
पढ़ा दो, एक गाना सुना दो,
लगता है जैसे बरसों बाद,
फिर बचपन ने आ के कहा हो —
"चलो, फिर से जी लेते हैं,
वो दिन जो कभी जिए थे हम,
इन नन्हे हाथों को थाम कर,
फिर से बच्चे बन लेते हैं हम।"
– सुनीता