वो जो शब्दों के बीच की रिक्तता है न
दरअसल,
वो रिक्तता नहीं ,
शब्दों के मध्य मौन में एक कविता है,
उस कविता में
एक स्त्री घर के गवाक्ष से
किसी एकाकी वृक्ष को देख रही है
जिसकी आधी शाखाओं पर फूल खिले हुए हैंं
आधी शाखाओं से पत्ते झर रहे हैं
वह मौन स्त्री सोच रही है कि
काश सुख और दुख का चक्र
जीवन का परिभ्रमण नहीं करता और
पत्तियों की हर शाख पर बसंत ही उमड़ता,
वो जो शब्दों के बीच की रिक्तता है न
दरअसल,
वो रिक्तता नहीं ,
शब्दों के मध्य मौन में एक कविता है,
उस कविता में दो प्रेमी
डूबते सूरज को घंटों निहारते हुए
मौन गहन संवाद कर रहे हैं कि
काश, मौन के इस भवसागर में
रात और दिन का अतिक्रमण नहीं होता
वो जो शब्दों के बीच की रिक्तता है न
दरअसल,
वो रिक्तता नहीं ,
शब्दों के मध्य मौन में एक कविता है,
उस कविता में
नदी है,पहाड़ है,आसमान है,विहग हैं,
पाषाण हैं ,जानवर हैं,
सभी का परस्पर अदृश्य संवाद है कि काश
हमारे मौन साहचर्य में इंसान का दखल न होता,
वो जो शब्दों के बीच की रिक्तता है न
दरअसल,
वो रिक्तता नहीं ,
शब्दों के मध्य मौन में एक कविता है,
उस कविता में
एक स्त्री है,दो प्रेमी हैं
चराचर हैं,
उनके अपने-अपने आह्वान
संवादों की संस्कृति
मौन अभिव्यक्ति है