आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शब्दों के बीच की रिक्तता।

                
                                                         
                            वो जो शब्दों के बीच की रिक्तता है न
                                                                 
                            
दरअसल,
वो रिक्तता नहीं ,
शब्दों के मध्य मौन में एक कविता है,

उस कविता में
एक स्त्री घर के गवाक्ष से
किसी एकाकी वृक्ष को देख रही है
जिसकी आधी शाखाओं पर फूल खिले हुए हैंं
आधी शाखाओं से पत्ते झर रहे हैं
वह मौन स्त्री सोच रही है कि
काश सुख और दुख का चक्र
जीवन का परिभ्रमण नहीं करता और
पत्तियों की हर शाख पर बसंत ही उमड़ता,

वो जो शब्दों के बीच की रिक्तता है न
दरअसल,
वो रिक्तता नहीं ,
शब्दों के मध्य मौन में एक कविता है,
उस कविता में दो प्रेमी
डूबते सूरज को घंटों निहारते हुए
मौन गहन संवाद कर रहे हैं कि
काश, मौन के इस भवसागर में
रात और दिन का अतिक्रमण नहीं होता

वो जो शब्दों के बीच की रिक्तता है न
दरअसल,
वो रिक्तता नहीं ,
शब्दों के मध्य मौन में एक कविता है,

उस कविता में
नदी है,पहाड़ है,आसमान है,विहग हैं,
पाषाण हैं ,जानवर हैं,
सभी का परस्पर अदृश्य संवाद है कि काश
हमारे मौन साहचर्य में इंसान का दखल न होता,

वो जो शब्दों के बीच की रिक्तता है न
दरअसल,
वो रिक्तता नहीं ,
शब्दों के मध्य मौन में एक कविता है,

उस कविता में
एक स्त्री है,दो प्रेमी हैं
चराचर हैं,
उनके अपने-अपने आह्वान
संवादों की संस्कृति
मौन अभिव्यक्ति है
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर