पाँच दिनों से
एक मकड़ी ने
थाम रखा है
छत का एक छोटा-सा कोना।
नीचे
एक गीला तौलिया,
और नीली बाल्टी में
वेंटिलेशन की जाली से
छनकर उतरती
दोपहर की रोशनी।
बाथरूम के बाहर कहीं
बर्तनों की आवाज़,
वॉशिंग मशीन की बीप,
और नए पड़ोसी के घर से
आती
पुराने गानों की धुन।
शायद छोटी
ज़िंदगियाँ भी
जानती हैं—
ठहरना।
और मैं
भागे जा रहा हूँ,
जैसे घड़ी की नोक से
निकल गया हो
एक
बेमकसद तीर।