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ठहरी हुई ज़िंदगी

SUNIL NAYI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पाँच दिनों से
        
                                                    
                            
एक मकड़ी ने
थाम रखा है
छत का एक छोटा-सा कोना।

नीचे
एक गीला तौलिया,
और नीली बाल्टी में
वेंटिलेशन की जाली से
छनकर उतरती
दोपहर की रोशनी।

बाथरूम के बाहर कहीं
बर्तनों की आवाज़,
वॉशिंग मशीन की बीप,

और नए पड़ोसी के घर से
आती
पुराने गानों की धुन।

शायद छोटी
ज़िंदगियाँ भी
जानती हैं—
ठहरना।

और मैं
भागे जा रहा हूँ,
जैसे घड़ी की नोक से
निकल गया हो
एक
बेमकसद तीर।
3 घंटे पहले
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