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गांव की लौटती यादें

sunil kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सड़क! तुम अब आई हो गाँव,
        
                                                    
                            
जब सारा गाँव चला गया शहर की छाँव।
आज मैं पहुँच भी जाऊँ गाँव,
किसके संग देखूँ बीती यादों की छाँव?

वो चौपाल, वो पीपल, वो मिट्टी की खुशबू,
वो रिश्तों की गर्मी, वो अपनापन और जादू।
अब घर तो हैं, मगर आँगन में नहीं कोई यार,
गाँव तो बचा है, पर खो गया है गाँव का प्यार।

अब शहर की भीड़ में चेहरे तो हजार हैं,
पर अपने कहने वाले कितने ही चार हैं।
दूरी ने रिश्तों के बीच खींच दी है दीवार,
गाँव से दूर हुए तो खुद से हुए बेकरार।

शहरों में सब हैं, मगर कोई अपना नहीं होता,
साथ बैठकर खाने का अब वो सपना नहीं होता।
हर चेहरा मिलता है, मगर दिल से मिलना कहाँ,
भीड़ बहुत है शहरों में, पर अपना कोई होता कहाँ।

अब भी याद आती है वो मिट्टी, वो घर, वो आँगन,
वो माँ की पुकार, वो अपनों का निश्छल अपनापन।
मन करता है लौट आऊँ फिर उसी गाँव की छाँव,
जहाँ हर साँस में बसता था अपना-सा एक भाव।

मगर वक़्त की मजबूरी भी कुछ कम नहीं होती,
रोटी की तलाश में हर चाहत पूरी नहीं होती।
दिल कहता है—चल लौट चल, छोड़ दे शहर का संसार,
पर डरता हूँ… गाँव में फिर कौन देगा रोज़गार?

काश! रोटी भी मिलती और गाँव भी बचा रहता,
माँ का आँगन, अपनों का साथ और वो बचपन सजा रहता।
फिर न सड़क से पूछना पड़ता—कहाँ गया मेरा गाँव,
और न आँखों को ढूँढ़नी पड़तीं यादों में उसकी छाँव।
एक महीने पहले
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