कहीं इंकार है लेकिन कहीं स्वीकार भी कुछ है।
मेरे घर की दीवारों के उस पार भी कुछ है
तनावों में जिंदा हैं, कि रिश्तों में दरारें हैं।
मगर शांति रहे कायम, यहां औजार भी कुछ है।
इधर सब्जी की खुशबू है, उधर है सूंघता कोई
न खिड़की है न दरवाजा,मगर बेतार भी कुछ है।
समय के साथ बहते हैं, समय के साथ रहते हैं
कभी मिलते बिछड़ते हैं समय की धार भी कुछ है।
लड़ाई है यहां पर रोज की यूं फुलझड़ी बातें
कि बातें हैं कसैली सी मगर फिर प्यार भी कुछ है।
-सुनील गुप्ता