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साहित्य जब हार जाता है सत्य से

Sunil Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी कहा गया था—
        
                                                    
                            
"कलम तलवार से तेज़ होती है,"
पर अब
कलम ब्रांड बन चुकी है,
और कागज़
प्रायोजित मौन का विज्ञापन।

जब एक कवि
सत्य की जगह
सुविधा को चुनता है,
तो उसकी कविता
क्रांति नहीं,
संकेतों में लिपटी चुप्पी बन जाती है।

साहित्य
जो होना था
प्रतिरोध की भाषा,
वह बन गया है
पुरस्कार की सीढ़ी।

नाटक अब
सरकारों के लिए मंचित होते हैं,
और कहानियाँ
संस्कृति की रक्षा के नाम पर
यथास्थिति का महिमामंडन करती हैं।

जब एक लेखक
कह नहीं पाता
कि युद्ध गलत है,
तो उसके पात्र
नायक नहीं,
समर्पित नौकर बन जाते हैं।

संपादक
अब सच्चाई नहीं ढूंढते,
वे देखते हैं—
क्या बिकेगा,
कौन बुरा मानेगा,
किससे विज्ञापन मिलेगा।

यही वह युग है
जहाँ
साहित्य हार जाता है सत्य से।

कवि मंचों पर पढ़ते हैं
देशभक्ति की कविताएं—
जिनमें
देश तो होता है,
पर
कभी भूखा पेट,
कभी मरता किसान,
कभी सवाल करता नौजवान
नहीं होता।

कभी कोई किताब
सत्य कहती है,
तो या तो
बैन होती है,
या
भुला दी जाती है।

और तब
शब्दों की दुनिया से
सत्य यह पूछता है—
"जब मैं जल रहा था,
तब तुम कहाँ थे?
-सुनील गुप्ता
 
5 महीने पहले
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