बातों के जंगल
उग आए हैं सड़क पर।
कानों के पोखरों में
जमा है।
तैर रहे हैं यहां
सदियों से आदमी।
कुछ धंस गए हैं
जंगलों में।
कांपती हुई आवाजों से
निकलते हुए इतिहास
जख्म और खून से
लथपथ
वर्तमान परिदृश्य में
धूमकेतु सा चमकते हैं
विलुप्त हो जाते हैं।
यहीं से निकल रहे हैं
बंदूक तोप तमंचे
यहीं से रेल और जहाज
बड़ी बड़ी मिसाइलें
पुल पुलिया बांध
और नई नई किताबें।
इन बातों के जंगलों में
प्रेम है
धोखा है
दया है
हिंसा है।
इन बातों के जंगलों में
विकास है।
पतन है।
अपना अपना
वतन है।
इन बातों के जंगलों में
वर्तमान है
भविष्य है।
इन बातों के जंगलों में
बड़े बड़े जानवर
विलुप्त है।
बड़े छोटे परिंदों के
परवाज हैं
कलरव है
झरने हैं
कल कल और आज हैं।
-सुनील गुप्ता