विज्ञापन

वो मिले तो मुक्कमल दास्ताँ हुई है

sumit singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सभी चाहते पूरी कहाँ होती है
        
                                                    
                            
मैं इसलिए कई ख्वाहिशें लिए फिरता हूँ

नजरे यहाँ से कुछ वहाँ भी जाती है
जमीं न मिले तो मैं आसमाँ की सोचता हूँ

खो गए है मगर अब खयाल ये सारे
एक चेहरा देखा था की अब उसी को ही देखता हूँ

वो मिले तो मुक्कमल दास्ताँ हुई है
कैसे हुआ मैं ये सोचता हूँ
2 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

S. L.

41 कविताएं

View Profile