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वो मिले तो मुक्कमल दास्ताँ हुई है

                
                                                         
                            सभी चाहते पूरी कहाँ होती है
                                                                 
                            
मैं इसलिए कई ख्वाहिशें लिए फिरता हूँ

नजरे यहाँ से कुछ वहाँ भी जाती है
जमीं न मिले तो मैं आसमाँ की सोचता हूँ

खो गए है मगर अब खयाल ये सारे
एक चेहरा देखा था की अब उसी को ही देखता हूँ

वो मिले तो मुक्कमल दास्ताँ हुई है
कैसे हुआ मैं ये सोचता हूँ
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एक घंटा पहले

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