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चलते चलते

sumit singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक लम्हें ही मिले जिंदगी से हम
        
                                                    
                            
मीलों दूरियों के हो गए
गुजर रहे थे बेखबर उनकी गलियों से
चलते चलते ही खो गए

हम खुदको ढुंढे कहाँ
ऐसी की ये हालत में
होश नहीं हमारे कम्बखत
मायने भी सो गए

आँख खुले तो दिल से चले जाना
कहीं रह न जाना नजरों में
देख लूँ जो तुम्हारी ओर
नहीं फिर तय हम तो गए

बच जाऊँ अगर तेरी आँखो को देखकर
जरा गले से लगा लेना
कहीं हालत न हो उनके जैसी
अब तलक इस रास्ते से जो गए

 
3 महीने पहले
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