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बस एक दफा

sumit singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उलझने मेरी और न बढाओ
        
                                                    
                            
कुछ है जो मेरा उसे मेरे हवाले करदो

यूँ ही खामखां जवानी बीत रही है
खुदा, कुछ असर हमारे दिल तक भी करदो

जमीं पर ही गले लगा लूँ
वो चाँद अगर एक दफा इधर दो

नजरे मेरी आसमाँ छू जाती है
मैं देखूं भी न उस और ये सरोकार कर दो

 
एक घंटा पहले
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