जो अंजाना था कल आज अपना लगे
तट विपासा का हम को सुहाना लगे!!
निशा में कभी जब नभ से मिला
मिले लाख तारे एक चांद था खिला
उस चांद से मिलकर मैंने कहा
तुमसे सुंदर कही एक चांद है मेरा
नटखट है बड़ा वो सुंदर चेहरा
नयनों में लगायें अञ्जन गहरा
अधरों में सुधा को बसाये सदा
उस चांद से सुन्दर जोचांद है मेरा
दिन में निहारा जिसे वोस्वप्नों में दिखा
स्वप्न की हर दशा को बदलता चला
देख कर जिसको यूं मैं खोसा गया
मेरे स्वप्नो में उसका ही ठीकाना हुआ
पढ़ी थी कहानी कभी जो कहीं
दीपशिखा का वर्णन मिला था वहीं
देखा उसको तो यह समझ आगया
दीपशिखा सी कहानी है वो मेरी।।2
उपवन में कई पुष्प देखें यूंही
देखा जब से उसे तो दिल खोगया
-सुमित जोशी