सच कहूं तुम मेरे जीते सपने हो
अलग घर के भले सही, मेरे अपने हो।
कुछ ऐसा खुमार,मुझपे छाया है
बचपन लौट मेरे दर आया है
तुम वर्षों के तप का प्रतिफल हो
सच कहूं, तुम मेरे जीते सपने हो।
बस एक ही लगन लगी अब तो
सर्वस्व अर्पण इस महायज्ञ को
मेरे हर कण की इसमें आहूति हो
सच कहूं, तुम मेरे जीते सपने हो।
दिन दूनी रात चौगुनी, तरक्की हो तुझमें
अंबर से अवनी तक,गुंज हो हर महफ़िल में
ज़र्रा ज़र्रा तेरी गाये गाथा,
तिमिर में दिखते दीपक हो,
सच कहूं, तुम मेरे जीते सपने हो।
तुम्हें सींच सींच कर, धरती का ऋण चुकाना है
हर जायज़ ख्वाहिश को, अमली-जामा पहनाना है
निराशाओं के भंवर में तुम, दिखते खेवनहारे हो
सच कहूं,तुम मेरे जीते सपने हो।
तुझे पता नहीं,भारत का भविष्य तुम्हारे हाथों में
पाक अमेरिका जैसों को, रखना है अपनी लातों में
उत्सव का दौर नहीं, देश निर्माण के भावी सिपाही हो
सच कहूं, तुम मेरे जीते सपने हो।