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पटना विश्वविद्यालय और जाति की दीवार

suman kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पटना विश्वविद्यालय आ रहा हूँ,
        
                                                    
                            
साथ मेरे एक दोस्त भी है—
हँसता है, बातें करता है,
कभी लगता है जैसे
हम सचमुच एक ही सफ़र के मुसाफ़िर हैं।

लेकिन उसके भीतर
एक और दुनिया बसती है—
जहाँ दोस्ती से पहले जाति पूछी जाती है,
इंसान से पहले पहचान देखी जाती है,
और रिश्तों के बीच
एक अदृश्य दीवार खड़ी रहती है।

मैं सोचता हूँ—
विश्वविद्यालय तो वह जगह है
जहाँ किताबें हमें सिखाती हैं
कि इंसान बराबर पैदा होता है,
फिर कुछ दिलों में
इतनी पुरानी दीवारें क्यों बची हैं?

हम एक ही रास्ते पर चलेंगे,
एक ही कैंपस में बैठेंगे,
एक ही भविष्य के सपने देखेंगे—
फिर भी शायद
वह मुझे मेरे नाम से नहीं,
मेरी जाति से देखेगा।

दुख इस बात का नहीं
कि उसकी सोच मुझसे अलग है,
दुख इस बात का है
कि हमारी दोस्ती के बीच
एक ऐसा शब्द आ खड़ा हुआ है
जिसे हमने पैदा नहीं किया था।

काश, पटना विश्वविद्यालय की
इन पुरानी इमारतों से
हम एक बात सीख पाते—
ईंटें अलग-अलग हों,
तो भी दीवार एक बनती है;
लेकिन इंसान अलग-अलग होकर भी
एक समाज बन सकते हैं।

दोस्त,
मैं तुम्हारी जाति नहीं पूछना चाहता,
मैं तुम्हारा दिल जानना चाहता हूँ।

क्योंकि जब हम दोनों
इस विश्वविद्यालय से निकलेंगे,
तो डिग्री पर
जाति नहीं—
हमारा नाम लिखा होगा।

और शायद उस दिन
तुम समझोगे—

दोस्ती की सबसे बड़ी पहचान
जाति नहीं,
इंसानियत होती है।
2 महीने पहले
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