कहा गया—
यह न्यायालय तुम्हारा है,
यह थाना तुम्हारा है,
यह अस्पताल तुम्हारा है,
यह विश्वविद्यालय तुम्हारा है।
मैंने कहा—
“अगर सब मेरा है,
तो मैं इतना बेगाना क्यों हूँ?”
मेरे ही पैसे से बनी दीवारें
मुझसे पहचान पूछती हैं,
मेरे ही अधिकारों की चौखट पर
मेरी औकात तौली जाती है।
मेरे ही नाम पर
कानून लिखे जाते हैं,
मेरे ही नाम पर
व्यवस्थाएँ बनती हैं,
फिर मेरे ही हिस्से का न्याय
कागज़ों में क्यों सोता है?
अस्पताल मेरा है—
पर दवा के लिए जेब देखी जाती है।
थाना मेरा है—
पर आवाज़ की ताकत देखी जाती है।
न्यायालय मेरा है—
पर न्याय तक पहुँचने की
लंबाई तारीख़ों में नापी जाती है।
विश्वविद्यालय मेरा है—
पर ज्ञान के आँगन में भी
कभी जाति, कभी वर्ग,
कभी पहचान की दीवार खड़ी मिलती है।
कितना अद्भुत लोकतंत्र है!
मालिक जनता,
चाबी किसी और के हाथ;
अधिकार जनता के,
निर्णय किसी और के साथ।
फिर भाषण होता है—
“सब बराबर हैं।”
और मैं मुस्कुराता हूँ।
क्योंकि
बराबरी किताब में बहुत सुंदर लगती है,
पर ज़मीन पर उतरते ही
उसके पैर में
कई अदृश्य बेड़ियाँ मिल जाती हैं।
सत्ता बदलती है,
कुर्सियाँ बदलती हैं,
अधिकारी बदलते हैं,
नारे बदलते हैं—
लेकिन एक सवाल
हर युग में खड़ा रहता है—
“लोकतंत्र में लोक कहाँ है?”
कभी जनता को
मतदाता बनाकर बुलाया जाता है,
कभी लाभार्थी बनाकर,
कभी भीड़ बनाकर,
कभी आँकड़ा बनाकर—
पर नागरिक बनाकर
कब सुना जाएगा?
मैं किसी भवन को
निजी कहने नहीं आया हूँ,
मैं तो बस इतना पूछता हूँ—
जिस व्यवस्था का मालिक
संविधान ने जनता को बनाया,
उस व्यवस्था में
जनता को मेहमान
किसने बना दिया?
याद रखो—
सरकारी भवन
सरकार की जागीर नहीं,
पुलिस की वर्दी
सत्ता का अहंकार नहीं,
अस्पताल की दीवारें
किसी की कृपा नहीं,
विश्वविद्यालय की शिक्षा
किसी वर्ग की बपौती नहीं।
ये सब
उस किसान की मेहनत हैं
जिसने कर दिया,
उस मजदूर का पसीना हैं
जिसने शहर बनाया,
उस नागरिक का अधिकार हैं
जिसने लोकतंत्र को
अपना विश्वास दिया।
इसलिए
जब अगली बार कोई कहे—
“सरकार तुम्हारे लिए कर रही है,”
तो विनम्रता से पूछना—
“मेरे लिए नहीं,
मेरे अधिकार से किया गया है—
फिर हिसाब किसे देना है?”
क्योंकि लोकतंत्र में
सबसे बड़ा प्रश्न
सरकार कौन है—यह नहीं;
सबसे बड़ा प्रश्न है—
“सरकार किसकी है?”
और जब इसका उत्तर
ईमानदारी से दिया जाएगा,
तब शायद
अदालत में जनता
सिर्फ़ मुकदमा लेकर नहीं,
विश्वास लेकर जाएगी;
अस्पताल में
सिर्फ़ मरीज नहीं,
मनुष्य देखा जाएगा;
और विश्वविद्यालय में
सिर्फ़ डिग्री नहीं,
विचार स्वतंत्र होंगे।
तब “सरकारी” शब्द
सिर्फ़ एक मुहर नहीं रहेगा—
वह जनता की
सर्वोच्चता का प्रमाण होगा।