बस्तों के बोझ तले दबी है मासूम सी मुस्कान,
रटने की इस दौड़ में, कहीं छूट रहा है विज्ञान।
अंकों के तराजू पर तौला जाता है आज का हुनर,
कहाँ खो गई वह जिज्ञासा, कहाँ गया वह अंतर्मन?
"शिक्षा का मतलब था सिर्फ रोशनी फैलाना,
पर आज मक़सद बन गया है बस एक ऊँचा पद पाना।"
क्लासरूम की चारदीवारी में बंद हैं सारे ख्वाब,
सिलेबस के पन्नों में ही सिमट कर रह गया हर जवाब।
प्रैक्टिकल की दुनिया से दूर, थ्योरी का घेरा है,
रट लो जो लिखा है बोर्ड पर, इसी में सवेरा है।
पर सोचो ज़रा, क्या यही है शिक्षा का असली आधार?
जो सोचने की क्षमता को ही कर दे लाचार?
ज्ञान वह नहीं जो सिर्फ परीक्षा में नंबर दिलाए,
ज्ञान तो वह है जो जीवन की मुश्किलों से लड़ना सिखाए।
बदलना होगा यह नज़रिया, बदलना होगा यह दौर,
जहाँ रटने की बजाय, सीखने का हो एक नया शोर।
डिग्रियों के कागज़ से ऊपर उठकर जब हम सोचेंगे,
तभी इस देश के नौनिहाल, नए क्षितिज को छू सकेंगे।