विज्ञापन

"नियति का निर्णय"

Suman Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यहाँ केवल विलापों से कभी बदलाव आता है?
        
                                                    
                            
नियति के क्रूर पन्नों को पुरुषार्थ ही बदल पाता है!
मर्यादा की दुहाई दे, रहे जो मौन सदियों से,
समय का चक्र उठकर आज, उनका न्याय माँगता है।

न समता की यहाँ बातें, न झूठे वादे काम आएँ,
उठाओ चेतना का धनुष, कि सब प्रतिशोध जाग जाएँ।
जो कायर भाग्य रोते हैं, वे मिट्टी में मिल जाते हैं,
मगर जो रण में अड़ जाते हैं, इतिहास उनका नाम गाता है।

दिखावे के उजालों से, अंधेरे कम नहीं होते,
जो सच के वास्ते लड़ते हैं, वो रातों में नहीं सोते।
सिंहासन हिल रहे हैं आज, जनता की हुंकारों से,
लिखो मस्तक पर इंकलाब, जो सदियों की निराशा है।

रगों में खून है बहता, या केवल पानी भरा तुमने?
अन्याय के इस तमस में, क्यों मस्तक झुका रखा तुमने?
उठो, शंखनाद कर दो अब, कि यह अंतिम परीक्षा है,
तुम्हारी भुजाओं के बल पर ही, टिका यह राष्ट्र सारा है।

बनाकर काँच के महल, जो खुद को भूप कहते हैं,
वे भूल बैठे कि भूखे पेट ही तूफ़ान सहते हैं।
जब माटी जाग उठती है, तो तख़्त-ओ-ताज हिलते हैं,
कुचल देती है जो शोषण को, जनता वह धारा है।

अतीत का शौर्य याद करो, तुम इस पावन धरा के सुत,
क्यों सहते हो यह हीनता, बनकर किसी के दास-अदभुत?
जहाँ वीरों ने हँस-हँसकर, शीश के दान दिए अनगिन,
उसी पावन धरोहर का, मिला हमको सहारा है।

पत्थरों के इन शहरों में, अब आइना दिखाना है,
जो सोए हैं भ्रम की नींद में, उनको जगाना है।
यह युद्ध केवल अस्त्रों का नहीं, यह चेतना का है,
दिखा दो आज दुनिया को, कि भारत क्या हमारा है।

जब तक गगन में सूर्य-शशि, चमके अलौकिक तेज से,
तब तक यह कौम मुक्त रहे, हर क्रूर परिवेश से।
सर्वस्व अर्पण कर जिएँ, जननी की वेदी पर,
लहराए विजय का केतु यह, जो हमारा भाग्य-तारा है।
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all