पुस्तकालय वीथि में
ऋग्वेद के पन्ने खुले-
इंद्र से ऋषियों की
करबद्ध प्रार्थना
वर्षा की, मधुरस
मधुधार की
अनवरत याचना।
शत्रुओं का अंत हो
अन्नादि भरे कोष
वैभव हो सुख-संतोष-
उड़ रहीं ऋचाएं हर ओर
जैसे बादल उमड़ते घनघोर।
वर्षा दबे पांव
जाने कब आ गई
आई तो छा गई
वातायन पर टिकी आंख
धुंधलायी दृष्टि।
पुकार उठा दूर पर
मोर जैसे भावविभोर-
छतरी की छत्र छाया
सुरक्षित कर कुसुम काया
चरण चल पड़े हैं
स्वतः उस ओर।