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उड़ रहीं ऋचाएं

Sudha Kumari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पुस्तकालय वीथि में
        
                                                    
                            
ऋग्वेद के पन्ने खुले-
इंद्र से ऋषियों की
करबद्ध प्रार्थना
वर्षा की, मधुरस
मधुधार की
अनवरत याचना।

शत्रुओं का अंत हो
अन्नादि भरे कोष
वैभव हो सुख-संतोष-
उड़ रहीं ऋचाएं हर ओर
जैसे बादल उमड़ते घनघोर।

वर्षा दबे पांव
जाने कब आ गई
आई तो छा गई
वातायन पर टिकी आंख
धुंधलायी दृष्टि।

पुकार उठा दूर पर
मोर जैसे भावविभोर-
छतरी की छत्र छाया
सुरक्षित कर कुसुम काया
चरण चल पड़े हैं
स्वतः उस ओर।
एक महीने पहले
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