आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

उड़ रहीं ऋचाएं

                
                                                         
                            पुस्तकालय वीथि में
                                                                 
                            
ऋग्वेद के पन्ने खुले-
इंद्र से ऋषियों की
करबद्ध प्रार्थना
वर्षा की, मधुरस
मधुधार की
अनवरत याचना।

शत्रुओं का अंत हो
अन्नादि भरे कोष
वैभव हो सुख-संतोष-
उड़ रहीं ऋचाएं हर ओर
जैसे बादल उमड़ते घनघोर।

वर्षा दबे पांव
जाने कब आ गई
आई तो छा गई
वातायन पर टिकी आंख
धुंधलायी दृष्टि।

पुकार उठा दूर पर
मोर जैसे भावविभोर-
छतरी की छत्र छाया
सुरक्षित कर कुसुम काया
चरण चल पड़े हैं
स्वतः उस ओर।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर