कविता
शब्दों की गलियों में,
टकराकर बड़ी हुई,
कभी खेली पहेलियों से,
कभी संग सहेली बनी।
कभी पौरुष की कहानी,
कभी महकी अनजानी,
कभी खूब मस्तानी,
हर रूप में अपनी रवानी।
नए युग का नया चलन,
नए रंग, नया आकर्षण,
क्या मेकअप, क्या ड्रेसअप—
हर पल रहती तैयार।
है वो बड़ी होनहार,
बदलते समय की भागीदार,
शब्दों को नया रूप देती,
भावों को करती साकार।
कभी जलेबी-सी उलझी हुई,
कभी सरल, सीधी-सी बातें।
कभी रौनक, कभी कहानी,
कभी चुप्पी, कभी जुबानी।
कभी महफिल की जान बनी,
कभी बिल्कुल अनजानी रही।
समय के साथ बदलती रही,
हर दौर में ढलती रही,
शब्दों की इस दुनिया में,
अपनी पहचान बनाती रही।
कविता है—जो कभी कही,
कभी अनकही,कभी समझी,
कभी अनजानी,
हर बार नया रूप धरकर,
फिर भी वही…हमारी अपनी कविता।