आज फिर से बारिश हो रही है
घर चू रहा है
आंगन का मिट्टी दौड़ रहा है
दीवाल गीली हो रही है
ढहती मिट्टी की एक एक कण
आँखों के सामने बह रही है
सब के सब मेरे शक्ति से बाहर!
पीछले साल का उधार बाक़ी है
इस साल भी उधार की मिट्टी लानी होगी
उसके सामने खड़ा होना होगा
अपना रोना रोना होगा
तब जाकर इन ढहते दीवार में
गड्ढा बनते आँगन में
ओसारे की दरकती परतों में
मिट्टी का नया लेप होगा
नया जीवन होगा
नई चमक होगी
कल के बारिश में
फिर से भीगने के लिए,
पानी की धार में बह जाने के लिए
फिर से हाथ फैलाने के लिए
सोचती हूँ पैसा चुकता हो पाएगा?
दिन बढ़िया हो पाएगा?
आखिर कब!
आखिर कब?