स्वतंत्र मिला देश को,
पर देशवासी स्वतंत्र कहाँ?
बंधन टूटे शासन के,
पर मन का भय समाप्त कहाँ?
स्वतंत्रता के नाम पर
नारी ने घर से कदम बढ़ाए,
आत्मनिर्भर बनने की चाह में
कार्यालयों तक पंख फैलाए।
राहों में ताने, छेड़छाड़,
हर दिन सहती अपमान;
चिड़िया-सी बचत करती रहती,
भूल गई अपना सम्मान।
मन में हर पल चिंता रहती—
"मेरे बच्चे सुरक्षित हैं या नहीं?"
कौन, कब, किस रूप में आकर
छीन ले सुख-शांति कहीं।
गाढ़ी कमाई जोड़-जोड़कर
भविष्य के सपने बुनती है;
ईश्वर से बस यही प्रार्थना—
संतान सदा सन्मार्ग चुने।
चिंता रहती मान-मर्यादा की,
परिवार सदा सुरक्षित रहे;
न पति, न संतान कभी
नशे की राह पर भटके।
असुरक्षा और वेदना से भरे
इस जीवन में बताओ,
यदि हर पल भय ही साथी हो,
तो स्वतंत्रता कहाँ पाओ?
किसने छीन लिए वे सपने,
किसने छीनी निश्चिंत निद्रा?
किसने मन में बो दिए
हर क्षण चिंता के बीज?
भावी की चिंता करें,
या अतीत की भूलों पर रोएँ?
वर्तमान की इस हाहाकार में
क्या सचमुच स्वयं को स्वतंत्र कहें?
देश स्वतंत्र है, यह सत्य है,
पर मन को कब मिलेगी मुक्ति?
जब भय, अन्याय और असुरक्षा मिटें,
तभी होगी सच्ची स्वतंत्रता की प्राप्ति।
-कौस्तुभा