विज्ञापन

तूफ़ानी बरसात की रात

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            घिर आए काले बादल, बिजली की कड़क हुंकार भरी,
        
                                                    
                            
आँधी ने विकराल रूप से निरीहों की आत्मा डरी।
टप-टप बूंदें बरस रहीं, फिर मूसलधार बरसात हुई,
एक गरीब के घर में जैसे विपदा की कोई रात हुई।

फूस का छप्पर उड़ा और दीवारों ने भी दम तोड़ दिया,
सपनों का मेरा आशियाना पल भर में दिल तोड़ दिया।
बिस्तर, कपड़े, अन्न मेरे दृग समक्ष बहे जाते थे,
बच्चे माँ से लिपट-लिपटकर भय से आँसू बहाते थे।

खाने के लिए रखी रोटी भी पानी में गल जाती थी,
चूल्हे की बुझती राख स्वयं ही अपनी कथा सुनाती थी।
भीगे तन, भीगा जीवन, भीगी आशाओं का संसार,
निर्दय मौसम हँसता जैसे बनकर उनका पहरेदार।

माँ बच्चों को बाँहों में लेकर आँचल फैलाए खड़ी रही,
पिता नज़रें टूटती दुनिया देख के केवल विवश रही।
कहाँ मिले अब एक सहारा, किस दरवाज़े हम जाएँ ?
इस तूफानी काली रात में किसको अपना हम कह पाएँ ?

मेघ गरजता रहा निरंतर, धरती भी चुपचाप रही,
मानवता की आँखों में करुणा जैसी कोई बात नहीं।
काश! कोई थोड़ा हाथ बढ़ाकर, थोड़ा सा आसरा दे देता,
भीगी पलकों में जीवन का थोड़ा उजियार हो लेता।

तूफ़ान केवल छप्पर ही नहीं, अरमान भी उड़ा ले जाता है,
गरीब का छोटा-सा जीवन पल भर में बिखर जाता है।
जिसके पास नहीं कुछ भी है, उससे भी सब छिन जाता है,
फिर भी वह हर नई सुबह में जीने का साहस पाता है।
-सूबा लाल "अंजाना"
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all