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सीमा।पर साँसें

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            घर से दूर, परिवार से दूर,
        
                                                    
                            
सीमा पर रहता था,
देश के खातिर जान हथेली पर,
सदा लिए फिरता था।

घर से बेखबर कई-कई दिन,
ड्यूटी पर यूँ रहता था,
देश सुरक्षित रहे सदा,
बस यही भाव मन में रहता था।

धूप हो चाहे कड़कड़ाती ठंड,
बारिश हो या तूफ़ाँ,
सीमा पर डटा रहा हरदम,
देश बना उसकी पहचान।

माँ की ममता याद सताती,
बच्चों की आती याद,
पत्नी भी राह निहारा करती,
कब आएँगे घर आज।

पर कर्तव्य पुकार रहा था,
पीछे हटना सीखा न था,
देश की खातिर जीवन अपना,
कभी स्वयं का समझा न था।

आज वही बीते दिन यादों में,
मन को बहुत रुलाते हैं,
सीमा पर बिताए वे पल ही,
जीवन का गौरव बन जाते हैं।

साँस-साँस में देश रहा था,
देश ही उसकी शान था,
परिवार से दूर रहा फिर भी,
भारत अपना प्राण था।
-सूबा लाल "अंजना"
एक घंटा पहले
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