सबकी मंज़िल एक ही है, हम सब सफ़र के यात्री,
कोई पहले पहुँच जाता है, कोई राह में बचते बाकी।
कोई राह में नहीं रहेगा, सब मंज़िल तक जाएगा,
मिट्टी से आया हर प्राणी, मिट्टी में मिल जाएगा।
इसी मिट्टी से जुड़े हुए थे, इसी से आज जुड़े हैं,
मंज़िल तक के सफ़र में भी, इससे ही जुड़े रहेंगे।
लालच की सारी दुकानें, यहीं धरी रह जाएँगी,
खानदान के सारे खिलौने,अपनों में बँट जाएँगे।
जिस धन पर अभिमान किया, वह साथ नहीं जाएगा,
खाली हाथ जगत में आया, वैसे ही तू जाएगा।
-सूबा लाल ‘अंजाना’